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Monday, 13 March 2017

वो 5 कारण जिसके लिए "तावड़ो" फिल्म आप को जरुर देखनी चाहिए



जब से राजस्थानी फिल्म तावड़ो बननी शुरू हुई है तभी से राजस्थानी सिनेमा जगत में गजब का उत्साह है. लोग इस तावड़ो फिल्म को लेकर अति उत्साहित है क्योंकि एक अनुमान के अनुसार यह राजस्थानी भाषा की सबसे बड़ी हिट फिल्म भी हो सकती है. यह फिल्म 31 मार्च 2017 को रिलीज़ होगी. इस फिल्म के निर्माता तेजकरण हर्ष हैं और तावड़ो के निर्देशक विजय सुथार है. यहाँ हम उन पांच कारणों की बात करेंगे जिनके कारण सभी राजस्थानियों को यह फिल्म देखनी चाहिए.   

1.क्योकि यह एक राजस्थानी फिल्म है : एक राजस्थानी होने के नाते हमारा कर्तव्य है की हम अपनी संस्कृति को बढ़ावा देंवे और उसका पोषण करें. फिल्म एक सशक्त माध्यम है अपनी संस्कृति का प्रचार प्रसार करने का. इसके अतिरिक्त ये फिल्म राजस्थानी भाषा में बनी है. राजस्थानी भाषा आज बहुत सी चुनौतियों से गुजर रही है यहाँ तक की लोग अपने घर में भी बच्चो से राजस्थानी में बात करना पसंद नहीं करते. बल्कि एक तथ्य ये भी है की राजस्थानी भाषा किसी भी दृष्टिकोण से किसी भी अन्य भाषा से कम नहीं है. यदि हम इस फिल्म तावड़ो को देखते है और इसे सफल बनाते है तो और भी लोग आगे आयेंगे और ऐसे अन्य नवाचार भाषा के पोषण के लिए करेंगे और इस फिल्म की सफलता राजस्थानी भाषा के विकास के लिए एक छोटा सा कदम होगा जिसे आप और हम मिलकर बढ़ाएंगे.
2.तावड़ो द्वारा तीन अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड का जीतना: तावड़ो फिल्म ने राजस्थान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (रिफ) में तीन अवार्ड भी जीतें है. इस महोत्सव में पूरे विश्व से फिल्मे दिखाई जाती है, इस बार भी इस फिल्म महोत्सव में फ्रेंच, इटालियन इत्यादि फिल्मे आई परन्तु बाजी मारी तावड़ो ने. तावड़ो ने इस महोत्सव (रिफ) में 3 अवार्ड जीते जिनमे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवार्ड और सर्वश्रेष्ठ संगीत का अवार्ड भी शामिल है और इस फिल्म ने बेस्ट फिल्म का अव्वार्ड भी जीता है. तावड़ो का  अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड जीतना सम्पूर्ण राजस्थान के लिए एक अत्यंत गर्व की बात है और आपको इस फिल्म को जरुर देखना चाहिए.
      
                                               
                  
3.प्रीती झिंगयानी की दमदार भूमिका: प्रीती झिंगयानी को आज किसी परिचय की आवश्यकता नहीं हैं. प्रीती बड़े बड़े बैनर जैसे यशराज फिल्म्स के साथ काम कर चुकी है और शाहरुख़ खान जैसे बड़े सुपर स्टार के साथ काम कर चुकी है. प्रीती मोहब्बतें फिल्म में जिमी शेरगिल के सामने थी इसी फिल्म में शाहरुख़ खान की प्रमुख भूमिका थी. एक इंटरव्यू में जब प्रीती झिंगयानी से पूछा गया की आपने राजस्थानी फिल्म क्यों की तो उन्होंने बताया की तावड़ो फिल्म की कहानी ने उनके दिल को छु लिया और वो झट से इस फिल्म में काम करने के लिए तैयार हो गयी. प्रीती झिंगयानी जैसे बड़ी हस्ती का राजस्थानी फिल्म के साथ जुड़ना यह बताता है की राजस्थान की फ़िल्में किसी से कम नहीं है और जरुरत है तो सिर्फ उत्साह बढाने की. यदि यह फिल्म सफल होती है तो हम देखेंगे की आने वाले समय में और भी बड़े बॉलीवुड सितारे राजस्थानी फिल्म में काम करने लिए आतुर होंगे. इस फिल्म के लिए प्रीती झिंगयानी ने RIFF अवार्ड भी जीता है |

4.फिल्म का संगीत:
इस फिल्म का संगीत जाने माने संगीत क़र ललित पंडित के द्वारा दिया गया है. ये वो ही ललित पंडित है जो पहले जतिन ललित की जोड़ी में साथ संगीत दिया करते थे. जतिन-ललित की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को बहुत सी यादगार संगीतमयी फ़िल्में दी है. जतिन ललित की जोड़ी ने ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे, मोहोब्बतें, कुछ कुछ होता है, जो जीता वो सिकंदर जैसे ना जाने कितनी फिल्मों में अपना संगीत दिया है. तावड़ो में उनका जुड़ना एक अच्छे संगीत की गारंटी तो दे ही देता है. तावड़ो फिल्म के लिए ललित पंडित को RIFF अवार्ड भी मिला है | ललित पंडित से जब तावड़ो फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया की वो इस फिल्म की कहानी से बहुत प्रभावित हुए और इस फिल्म की कहानी बहुत ही संवेदनशील है और इस कारण उन्होंने अपने पहली राजस्थानी फिल्म में संगीत दिया है | यदि आप ललित पंडित के फेन है तो आपको ये फिल्म अवश्य देखनी चाहिए |
इस फिल्म में ललित पंडित ने गाने प्रसिद्ध गायक शान और दिव्या कुमार से गवाएं है जिन्होंने बहुत से हिट गाने गायें है. शान ने लगभग सभी बड़े हिंदी सिनेमा के अभिनेताओं के लिए अपनी आवाज दी है, चाहे वो शाहरुख खान हो, सलमान खान हो, आमिर खान हो चाहे हृतिक रोशन हो या कोई अन्य बॉलीवुड स्टार हो | शान द्वारा गाये गए गानों में ‘चाँद सिफ्रारिश, ‘बहती हवा सा था वो’, ‘आज उनसे मिलना है हमें’, ‘तनहा दिल’, ‘हे शोना’, ‘जब से तेरे नैना इत्यादि है. दिव्या कुमार भी एक प्रसिद्ध गायक है जिन्होंने अपनी आवाज कई बॉलीवुड फिल्मों में दी है उनके द्वारा गाये गए गाणों में प्रमुख गाने है ‘आफतों के परिंदे’, ‘हवन करेंगे’, ‘शुभारम्भ’ आदि. शान इस समय वौइस् इंडिया नामक शो में जज की भूमिका भी निभा रहे हैं.  

5.बड़े बजट की फिल्म: तावड़ो फिल्म राजस्थानी भाषा की फिल्मों में बनने वाली फिल्मो में सबसे अधिक बजट की फिल्मों में से एक है. इस फिल्म में ना केवल स्थानीय कलाकारों ने काम किया है बल्कि कई बड़े बॉलीवुड के कलाकारों ने भी काम किया है. आपको यह फिल्म देखनी चाहिए और इसका प्रचार करना चाहिए क्योंकि इससे और भी बड़े बजट की फिल्मे राजस्थान में बनेंगी और राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री भी अन्य राज्यों की फिल्म इंडस्ट्री जैसे दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री, या भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की तरह स्थापित हो सकेगी.   

बॉलीवुड के साथ कनेक्शन: तावड़ो फिल्म में बहुत से कलाकार बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री से है. जिनमे से मशहूर कलाकार प्रदीप काबरा भी हैं, काबरा को आपने कई फिल्मो में खलनायक की भूमिका में देखा होगा, प्रदीप काबरा इससे पहले सुपरस्टार सलमान खान, ह्रितिक रोशन और शाहिद कपूर के साथ काम कर चुके हैं |डांस इंडिया डांस में अपना जलवा दिखा चुके बाल कलाकार सचिन चौधरी भी इस फिल्म में एक प्रमुख भूमिका में हैं. आपको पिपली लाइव फिल्म के नत्था (ओमकार) तो याद होंगे ही, वो भी इस फिल्म में अपनी दमदार भूमिका में हैं. पिपली लाइव के नत्था के रोल को आमिर खान खुद करना चाहते थे किन्तु उन्होंने इस रोल के लिए ओमकार को चुना. सूत्रों के अनुसार तावड़ो में ओमकार का रोल देखकर लोग पेट पकड़ कर हंसने को मजबूर हो जायेंगे |  आप कल्पना कर सकते है की इतने बड़े बड़े बॉलीवुड कलाकार यदि राजस्थानी फिल्म में होंगे तो फिल्म कितनी मनोरंजक होगी. यदि आप इन कलाकारों के फेन है तो आपको यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए.   


ये कुछ कारण थे जिनके कारण आपको तावड़ो फिल्म देखनी चाहिए. आशा करते है की यह पोस्ट आपको पसंद आई होगी. इस पोस्ट को आगे शेयर करें और आपके यदि कोई सुझाव हैं तो कमेंट बॉक्स में अवश्य देंवे |

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Tuesday, 21 February 2017

राजस्थानी भाषा साहित्य : संक्षिप्त इतिहास
पिछली पोस्ट में हमने भाषा और राजस्थानी भाषा के इतिहास, उसका वितरण एवं यहाँ बोली जाने वाली समस्त बोलियों के बारे में पढ़ा और राजस्थानी भाषा द्वारा जो चुनौतियाँ झेली जा रही है उसके बारे में भी जाना | आज हम राजस्थान के समृद्ध साहित्य के बारे में बात करेंगे.

राजस्थानी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है | इसकी शुरुआत 11 वी शताब्दी से हुए जब मरू-गुर्जरी भाषा का विकास हुआ | राजस्थानी साहित्य को समय के आधार पर 3 भागो में विभाजित किया गया है |
  1. प्रारंभिक दौर (1100-1450)
  2. मध्य दौर (1450-1850)
  3. आधुनिक दौर (1850 1950)
राजस्थानी साहित्य का उसके विषय और शैली के अनुसार भी निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया गया है –
  • राजस्थानी जैन साहित्य
  • राजस्थानी चारण साहित्य
  • राजस्थानी संत साहित्य
  • राजस्थानी लोक साहित्य
हम सबसे पहले समय के आधार पर किए गए वर्गीकरण पर बात करते हैं |
प्रारंभिक दौर
राजस्थानी भाषा का सन 1169 से पूर्व का कोई भी लिखित साहित्य उपलब्ध नहीं है क्योंकि उस समय यह भाषा केवल बोली जाती थी. इसलिए राजस्थानी साहित्य की शुरुआत 11 वी  शताब्दी में मानी जाती है. राजस्थानी भाषा के साहित्य का शुरुआती काल सन 1100 से लेकर चौदहवीं शताब्दी के मध्य तक माना जाता है. इस काल में मुख्य तया जैन धर्म के विद्वानों ने राजस्थानी भाषा के साहित्य की तरफ काफी कार्य किया, जैन विद्वानों द्वारा रचित साहित्य निम्न प्रकार का है  
  • विज्रसेन सूरी द्वारा रचित भारतवर्ष  वर बाहु बली घोर
  • शालिभद्र सूरी द्वारा रचित भार्तेस्वर बाहुबली रास
  • असिग द्वारा रचित जियादार्य रास
  • जिन्प्रभा सूरी द्वारा पद्मावती चौपाई
  • हेमराज द्वारा रचित स्तुलिभाद्र फाग
  • विझाना द्वारा रचित ज्ञान मंजरी
     इस काल में कुछ जैन विद्वानों के अतिरिक्त दूसरे लोगों ने भी कुछ साहित्य की रचना की और जो की निम्न है.
  • 12 वी सदी  में चंदबरदाई द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो
  • गदन शिवदास द्वारा रचित खिंची री वचनिका
  • नरपति नाथ द्वारा रचित विसाल रास
  • श्रीधन द्वारा रचित रान्माल चंदा
मध्यकाल दौर
राजस्थानी साहित्य के मध्यकाल की शुरुआत सन 1450 से मानी जाती है, इस काल को राजस्थानी साहित्य का स्वर्णिम काल माना जाता है. इस काल में बहुत सा साहित्य लिखा गया. उनमे से कुछ कृतियाँ निम्न है   
  • साल 1455 में पद्मनाभ ने कन्हाद्दे प्रबंध लिखी. यह उस समय की एक ज्ञानकोष मानी जाती है  
  • ढोला मारू जैसी मशहूर कृति कल्लोल द्वारा सन 1473 में लिखी गयी  
  • भंडारी व्यास द्वारा 1481 में हम्मिरायण लिखी गई
  • बुद्धि रासो को सन 1568 में जल्लाह के द्वारा लिखा गया
  • खुम्मान रासो दलपत द्वारा 17 वी शताब्दी में लिखा गया
  • हालन झालण रा कुण्डलिया बिरथ इस्र्दास द्वारा लिखी गयी थी
आधुनिक काल में राजस्थानी साहित्य
राजस्थानी साहित्य का आधुनिक काल सन 1850 से शुरू हुआ. इस काल में बहुत से साहित्य प्रकाशित हुए और फिर भी ऐसे भी कई साहित्य है जो प्रकाशित नहीं हो सके जिनसे राजस्थानी साहित्य का सर्वे करने में बहुत समस्या हुई |
इस काल में लिखे गए कुछ मुख्य साहित्य निम्न है –
  • उन्नीसवी शताब्दी में बूंदी के सूर्यमल मिश्र ने वंश भास्कर और वीर सतसई जैसे साहित्य लिखे. सूर्यमल मिश्र को राजस्थान का भूषण भी कहा जाता है.
  • इसी काल में अलवर के रामनाथ काव्या ने द्रौपदी विनया और पाबूजी रा सोराथा लिखी
  • दादूपंथी विद्वान स्वरुप दास ने पांडव यशेदु चन्द्रिका लिखी
  • उन्नीसवी शताब्दी में महाराजा चतुर सिंह जी ने पतंजलि योगसूत्र और गीता को मेवाड़ी भाषा में अनुवादित किया
  • मेघराज मुकुल ने सेनानी नमक कविता को स्वरबद्ध किया

शैली व विषय के आधार पर राजस्थानी साहित्य का  वर्गीकरण
राजस्थानी साहित्य का उपरोक्त वर्गीकरण समय के आधार पर किया गया है . हमने देखा की अलग अलग समयावधि में बहुत से साहित्यिक कार्य हुए. राजस्थानी साहित्य में शुरू के युग से आधुनिक काल तक बहुत विकास हुआ. विषय और शैली के आधार पर भी एक वर्गीकरण किया गया है. वह वर्गीकरण निम्न प्रकार से है.
राजस्थानी जैन साहित्य
जैन विद्वानों द्वारा लिखित साहित्य को जैन साहित्य बोला जाता है. प्रारम्भ में जैन समुदाय का राजस्थानी साहित्य में बहुत बड़ा योगदान रहा. यह साहित्य विभिन्न जैन मंदिरों में सहेज कर रखा गया है. उस समय के प्रमुख साहित्यकारों में हेमचन्द्र सूरी, हृशिवर्धन सूरी और हेमरतन सूरी है |     

राजस्थानी चारण साहित्य
चारण समुदाय का राजस्थानी साहित्य के विकास में बहुत योगदान रहा है. चारण समुदाय के लोगों ने राजपूत राजाओं की वीरता और उनके रहन सहन का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है. चारण समाज के कुछ लेखक निम्न प्रकार से है
  • बादर धाडी ने वीर भायां नामक रचना लिखी
  • चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज रासो नामक रचना लिखी गयी
  • नैंसी ने नैंसी री ख्यात नामक रचना लिखी
  • बांकी दास ने बन्किदास री ख्यात नामक रचना लिखी
  • ढोला मारू रा दोहा भी चारण समुदाय से प्राप्त हुए
राजस्थानी संत समाज साहित्य
राजस्थान की भूमि ने बहुत से संतो को जन्म दिया है, जैसे मीरा बाई, राम स्नेही सम्प्रदाय के राम चरण जी इत्यादि. इन संतो ने भी साहित्य को अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है. संतो द्वारा साहित्य में दिए योगदान के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से है
  • मीरा की पदावली
  • दादू की वाणी
  • नरसिंग जी की वाणी
  • राम चरण जी की वाणी  
राजस्थानी लोक साहित्य
राजस्थान की लोक कलाएं पूरे विश्व में लोकप्रिय है, विश्व में राजस्थान के लोक संगीत का अपना एक विशिष्ट स्थान है. उसी प्रकार राजस्थान की लोक साहित्य का भी एक अपना स्थान है. लोक साहित्य में प्रचलित कहावतें, कहानियाँ इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है |

इस प्रकार हम देखते है की राजस्थान का साहित्य एक समृद्ध साहित्य है, राजस्थान के साहित्य ने जीवन के हर पक्ष को छूआ है. चाहे वह ख़ुशी का मौका हो अथवा गम का राजस्थान का साहित्य कविताओं गीतों, गद्य, व् पद्य के माध्यम से जीवन को परिचय करवाता है. समस्त राजस्थानियों का यह कर्तव्य है की अपने साहित्य की रक्षा करें और उस पर गर्व करें |      

Monday, 20 February 2017

राजस्थानी भाषा का इतिहास और आगे की चुनौतियाँ (भाग 2 )

इस ब्लॉग पोस्ट के प्रथम भाग में आपने राजस्थानी भाषा के इतिहास और उसके वितरण के बारे में पढ़ा अब आगे

राजस्थानी भाषा : कई बोलियों का समूह

राजस्थानी भाषा एक अकेली भाषा नहीं है किन्तु बहुत सी बोलियों का एक समूह है | इस भाषा में 9 से ज्यादा  बोलियों का संग्रह है जो की राजस्थान व इसके आस पास के इलाके में बोली जाती है
Rajasthani Language history and challenges


  • मारवाड़ी : यह राजस्थान में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, अनुमान के अनुसार लगभग 4 से 4.5 करोड़ लोग मारवाड़ी बोलते है |  राजस्थान के मारवाड़ इलाके में यह भाषा मुख्यतया बोली जाती है |
  • मालवी :  मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में लगभग एक करोड़ लोग मालवी भाषा को बोलते है |
  • धुन्धारी : राजस्थान के धुंधार क्षेत्र में यह बोली बोली जाती है |
  • हाडौती : हाडौती क्षेत्र में रहने वाले 40 से 50 लाख लोग इस भाषा का प्रयोग करते है |
  • मेवाड़ी : मेवाड़ क्षेत्र के लगभग 50 लाख लोग मेवाड़ी भाषा बोलते है |
  • मेवाती : मेवात राजस्थान और हरियाणा के कुछ क्षेत्रो को सम्मिलित रूप से बोला जाता है जहाँ लगभग 5 लाख लोग इस भाषा को बोलते है |
  • शेखावाटी : इस क्षेत्र के लगभग 30 लाख लोग इस भाषा को बोलते है |
  • बागड़ी : हरियाणा के उत्तर पश्चिम इलाके, पंजाब के दक्षिणी भाग और उत्तरी राजस्थान के कुछ निवासी इस भाषा का उपयोग करते है |  
  • निम्बाड़ी : मध्य प्रदेश और राजस्थान के निमार क्षेत्र में यह भाषा लगभग 22 लाख लोगो द्वारा बोली जाती है | 



राजस्थानी भाषा को आधिकारिक दर्जा 

राजस्थानी भाषा भारतीय उप महाद्वीप की एक पुरातन भाषाओँ में एक है | बहुत सा साहित्य इस भाषा में लिखा गया है | ना केवल साहित्य बल्कि बहुत से लोकगीत, कहानियां और नाटक इत्यादि इसमें लिखे गए है | परन्तु इन सब के बावजूद अभी तक इस भाषा को सरकार से आधिकारिक दर्जा नहीं दिया गया है | सन 1873 में एक पश्चिमी विद्वान केल्लोग जिसने बाइबिल का हिंदी में अनुवाद किया उसने राजस्थानी भाषा को हिंदी की एक उप भाषा माना था | जॉर्ज ग्रियर्सन ने समस्त राजस्थानी बोलियों को सामूहिक तौर पर राजस्थानी भाषा का नाम दिया था |
आज राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने के लिए काफी प्रयास किये जा रहे है | राजस्थानी भाषा को अब साहित्य अकादमी और ugc के द्वारा अलग भाषा माना जाता है यहाँ तक की अब बहुत सी यूनिवर्सिटी राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ा रही है | राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने भी राजस्थानी भाषा को अपने एक वैकल्पिक विषय के रूप में अपने कोर्स में शामिल किआ हैं |
हालाँकि  अभी तक राष्ट्रीय मान्यता को दिलवाने के लिए और प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, सन 2003 में राजस्थान विधान सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमे राजस्थानी भाषा को भारत के संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करवाने की बात कही गयी | राजस्थान के समस्त 25 सांसदों और राजस्थान के वर्तमान मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया ने भी अपना सहयोग इस मुद्दे पर दिया है |

आगे की राह 

राजस्थानी भाषा आज बहुत सी चुनौतियों का सामना कर रही है  | कोई आधिकारिक काम राजस्थानी भाषा में नहीं हो रहा, जिसके कारण पढ़े लिखे लोग राजस्थानी भाषा की उपेक्षा करने लगे है | यहाँ तक की लोग अपने बच्चो को भी राजस्थानी भाषा नहीं सिखाना चाहते, बल्कि वे चाहते है की उनके बच्चे हिंदी अथवा अंग्रेजी में बात करें | इस उपेक्षा के कारण राजस्थानी भाषा ह्रास की और जा रही है  |
यह हम सभी राजस्थानियों की जिम्मेदारी है की इस भाषा को सरंक्षित करें | विशेष तौर पर युवा वर्ग इसमें अपनी एक भूमिका निभा सकता है  | युवा वर्ग को चाहिए की वो आपस में बातचीत में ज्यादा से ज्यादा राजस्थानी भाषा का प्रयोग करें , जिससे राजस्थानी भाषा को और अधिक बल मिल सके | राजस्थानी भाषा और राजस्थान की संस्कृति बहुत समृद्ध है, जरुरत है तो सिर्फ इसके संरक्षण की और  इसपे गर्व किये जाने की |

इस ब्लॉग का पहला भाग यहाँ पढ़े -  Rajasthani Language history and challenges (part 1)

इस ब्लॉग को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े - 

Rajasthani Language history and challenges (part 2)

Rajasthani Language history and challenges (part 2)

In the first section of this blog, we talked about history and distribution of Rajasthani language, now in part two, we will bring light to a group of languages spoken in Rajasthan.

  • Rajasthani Language: Cluster of Dialects


Rajasthani is not a single language, it is a collection of various dialects of Rajasthan. It is a compilation of more than 9 languages which are spoken in Rajasthan, and it’s adjacent areas. These dialects are as following.

  • Marwari: This dialect is most spoken in Rajasthan. Estimation is approximately 40 to 45 million people of Rajasthan speak Marwari. It is mainly spoken in Marwar part of the Rajasthan. Districts like Jodhpur, Bikaner, etc. falls in Marwar.
  • Malvi: Almost 10 million people from Malwa region of Madhya Pradesh speaks in this language.
  • Dhundhari: Dhundhari dialect is spoken in Dhundhar part of Rajasthan.
  • Harauti: Approximately 4 to 5 million habitants of Harauti region express themselves by this dialect.
  • Mewari: Approximately 5 million people from Mewar region speaks this Mewari dialect.
  • Mewat: Mewat comprises of some part of Rajasthan and Haryana where at least half million people do talk in Mewati language.
  • Mewari: Three million inhabitants from this region speaks in this Shekhawati dialect. 
  • Bagri: Northwest of Haryana, some part of southern Punjab along with northern Rajasthan inhabitants use this dialect.
  • Nimbadi: approximately 2.2 million speakers in the Nimar region of Madhya Pradesh and Rajasthan.


Official Status to Rajasthani Language



Rajasthan’s language is one of the ancient languages of the Indian subcontinent. A lot of literature is written in it. Not only writing but a tonne of folk songs, music, dramas, stories and plays are written in it. But still, Rajasthani language did not get official status from the government.  In 1873 a westerner Samuel H. Kellog, who translated the Bible in Hindi language, considered Rajasthani dialects a subgroup of Hindi language. George A. Grierson felt that all Rajasthani dialects should be jointly called Rajasthani Language.
Today some progress is being made in this field. Rajasthani is now recognised as a distinct language by Sahitya Academy and university grants commission. Now many universities are teaching this as their subject. Rajasthan board of secondary education included it as an optional subject in its course.
However, national recognition is still lagged, in the year 2003 Rajasthan state legislative assembly passed a unanimous resolution to insert recognition of Rajasthani into the 8th schedule of Indian constitution. All MPs from Rajasthan and chief minister Vasundhara Raje have voiced their support to Rajasthani language for this cause.

  • Challenges Ahead 

Rajasthani language is facing a lot of challenges in front of it. No official work is happening in Rajasthani language. Due to this, Rajasthani language is being ignored by educated people. Even some people do not want their children to talk in Rajasthani Language. They prefer Hindi or English instead of Rajasthani language. Because of this discrimination, Rajasthani language is going towards decay.
It is the responsibility of all the Rajasthani people especially youth to preserve this and use this language in their daily conversations. Our history and culture are very generous regarding content. Rajasthani language does not lack behind any language. It just needs to be preserved and being proud of it.